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ऋत्विज

 

टिप्पणी : सोमयाग में प्रातःसवन में आज्य स्तोत्र तथा आज्य शस्त्र होते हैं। पहले आज्यस्तोत्र का गायन होता है और उसके पश्चात् स्तोत्र विशेष के शस्त्र का उच्चारण किया जाता है। पहला स्तोत्र इसका अपवाद है। पहले होता का शस्त्र पाठ होता है, फिर स्तोत्र और उसके पश्चात् प्रउग शस्त्र। उसके पश्चात् दूसरा आज्यस्तोत्र, फिर मैत्रावरुण शस्त्र, फिर तीसरा आज्यस्तोत्र, उसके पश्चात् ब्राह्मणाच्छंसी ऋत्विज का शस्त्र। फिर चतुर्थ आज्यस्तोत्र, उसके पश्चात् अच्छावाक् नामक ऋत्विज का आज्यशस्त्र। ब्राह्मण ग्रन्थों(ऐतरेय ब्राह्मण २.३६, ताण्ड्य ब्राह्मण ७.२.१) में इसे आजि--संग्राम या होड की संज्ञा दी गई है।

 

प्रथम आज्यस्तोत्रम्(रथन्तरपृष्ठे)

 

अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये। नि होता सत्सि बर्हिषि॥

 

तं त्वा समिद्भिरङ्गिरो घृतेन वर्धयामसि। बृहच्छोचा यविष्ठ्य॥

 

स नः पृथु श्रवाय्यमच्छा देव विवाससि। बृहदग्ने सुवीर्यम्॥

 

गान विधि

 

हुम्। अग्न आयाहिवीतयोम्। ओमो ओओओओओओओ २ ओओओओओओ१२१२॥ हुम् आ२॥ ओओ॥ आ३४५॥(१) तन्त्वासमिद्भिरङ्गिरोम्॥ ओमोओओओओओओओ२ ओओओओओओ १२१२॥ हुम् आ२॥ ओओ॥ आ ३४५॥(२) सनःपृथुश्रवायियोम्॥ ओमोओओओओओओओ२ओओओओओओ१२१२॥हुम् आ२॥ ओओ॥आ३४५॥(३)

 

द्वितीय आज्य स्तोत्रम्(रथन्तरपृष्ठे)

 

आ नो मित्रावरुणा घृतैर्गव्यूतिमुक्षतम्। मध्वा रजा ँसि सुक्रतू॥

 

उरुश ँसा नमोवृधा मह्ना दक्षस्य राजथः॥ द्राघिष्ठाभिः शुचिव्रता॥

 

गृणाना जमदग्निना योनावृतस्य सीदतम्। पात ँ सोममृतावृधा॥

 

तृतीय आज्य स्तोत्रम्(रथन्तरपृष्ठे)

 

आ याहि सुषुमा हि त इन्द्र सोमं पिबा इमम्। एदं बर्हिः सदो मम॥

 

आ त्वा ब्रह्मयुजा हरी वहतामिन्द्र केशिना। उप ब्रह्माणि नः शृणु॥

 

ब्रह्माणस्त्वा युजा वय ँ सोमपामिन्द्र सोमिनः। सुतावन्तो हवामहे॥

 

चतुर्थ आज्यस्तोत्रम्(रथन्तरपृष्ठे)

 

इन्द्राग्नी आ गत ँ सुतं गीर्भिर्नभो वरेण्यम्। अस्य पातं धियेषिता॥

 

इन्द्राग्नी जरितुः सचा यज्ञो जिगाति चेतनः। अया पातमिम ँ सुतम्

 

इन्द्रमग्निं कविच्छदा यज्ञस्य जूत्या वृणे। ता सोमस्येह तृम्पताम्॥

 

उपरोक्त चार स्तोत्र रथन्तर पृष्ठ हेतु हैं। बृहत्पृष्ठ के स्तोत्र इनसे भिन्न हैं। प्रश्न यह उठता है कि आज्य स्तोत्रों के अनुष्ठान से क्या तात्पर्य सिद्ध होता है? ऐसा अनुमान है कि आज्य स्तोत्र चार दिशाओं में फैलने की प्रक्रिया हैं(इसके विपरीत स्थिति ऊर्ध्व अधो दिशा में गमन की होती है)। जैसा कि स्वर्गीय डा. फतहसिंह ने अपने लेखों में ध्यान दिलाया है, पूर्व दिशा ज्ञान की, दक्षिण दिशा दक्षता प्राप्त करने की, पश्चिम दिशा पाप नाश की व उत्तरदिशा आनन्द की दिशाएं हैं। होता ऋत्विज की स्थिति पूर्व दिशा में ज्ञान प्राप्त करने जैसी है। मैत्रावरुण ऋत्विज की स्थिति दक्षिण दिशा में दक्षता प्राप्त करने जैसी है(द्र. आज्यस्तोत्र में दक्ष शब्द)। होता सत्य है तो मैत्रावरुण ऋत। ब्राह्मणाच्छंसी ऋत्विज की स्थिति पश्चिम् दिशा में होनी चाहिए। लेकिन इसका प्रमाण देना होगा। ब्राह्मणाच्छंसी ऋत्विज को उज कहा गया है(ताण्ड्य ब्राह्मण २५.१८.१)। उज का अर्थ है उ से जन्मा हुआ। ओंकार में उ अक्षर से तात्पर्य धारण करने से, कुम्भक करने से लिया जाता है। अ से ग्रहण और म से विसर्जन होता है। पहले पृथिवी सूर्य की ऊर्जा को धारण करती है, फिर अपने अन्दर से वनस्पतियों आदि को निकालती है, विसर्जन करती है। ब्राह्मणाच्छंसी ऋत्विज के आज्य स्तोत्र में इन्द्र के रथ में केशी हरि-द्वय के जुडने का भी उल्लेख है। ऐसी ही स्थिति तब होती है जब सोमयाग के अन्त में उन्नेता नामक ऋत्विज द्रोणकलश को अपने सिर पर रखकर द्रोणकलश से अग्नि में सोम की आहुति देता है। द्रोणकलश का मुख ऊँ के आकार का होता है। कहा गया है कि ऋक् और साम इन्द्र के दो हरी हैं जो इन्द्र के रथ का वहन करते हैं। इस कथन को इस प्रकार समझा जा सकता है कि हमारे अपने रथ के हरी कौन से हैं? कहा गया है कि क्षुधा, तृष्णा आदि हमारे रथ के हरी हैं। हरियों में से एक के ऋक् होने से तात्पर्य हो सकता है कि किसी कार्य को करने से पहले ही उसके स्वरूप का पूर्वाभास हो जाना। साम से तात्पर्य हो सकता है कि हम सम अवस्था में हैं, क्षुधा-तृष्णा हमें प्रभावित नहीं करती। चौथे ऋत्विज अच्छावाक् का देवता इन्द्राग्नि है। अच्छावाक् का अर्थ है जब हमारे अन्दर से शुभ वाक् निकलने लगे। क्या अच्छावाक् का स्थान उत्तर दिशा में हो सकता है? अच्छावाक् को ताण्ड्य ब्राह्मण २५.१८.१ में यश कहा गया है। यश को यक्ष के आधार पर समझा जा सकता है। साधना में यक्ष यश का पूर्व रूप हो सकता है। यक्ष के विषय में शतपथ ब्राह्मण ११.२.३.५ में कहा गया है कि रूप और नाम ही ब्रह्म के महत् यक्ष हैं। अतः यह कहा जा सकता है कि अच्छावाक् ऋत्विज का कार्य नाम और रूप के दर्शन करना, किसी घटना के बाह्यतम रूप की अनुभूति करना है। यह उत्तर दिशा कही जा सकती है।

 

     सोमयाग में चार आज्यस्तोत्रों का स्पष्टीकरण भागवत पुराण के एक श्लोक के आधार पर भी किया जा सकता है। श्लोक यह है

 

ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च। प्रेम मैत्री कृपा उपेक्षा यः करोति स मध्यमः॥

 

अर्थात् जो ईश्वर से प्रेम, ईश्वर के आधीन रहने वालों से मैत्री, बालिशों या फैले हुओं पर कृपा और द्वेष रखने वालों की उपेक्षा करता है, वह मध्यम कोटि का भक्त है। सोमयाग के संदर्भ में होता का स्थान प्रेम का स्थान हो सकता है, मैत्रावरुण का स्थान मैत्री का, ब्राह्मणाच्छंसी का कृपा का व अच्छावाक् का उपेक्षा का। पहले दो स्थान तो न्यायोचित लगते हैं, लेकिन दूसरे दो को सिद्ध करने की आवश्यकता है। बालिशः का अर्थ फैला हुआ, बिखरा हुआ, वाल होता है। इस बिखरे हुए को समेटने का एक ही उपाय है कि किसी प्रकार से इसकी अव्यवस्था में, एण्ट्रांपी में ह्रास का प्रयास किया जाए। यह कृपा करना हो सकता है। क्या ब्राह्मणाच्छंसी ऋत्विज अपनी धारणा शक्ति द्वारा अव्यवस्था में ह्रास ला सकता है, यह अन्वेषणीय है। यह कहा जा सकता है कि बिखरे हुए को धारण करना ही कठिन है। यह उल्लेखनीय है कि पुराणों में जब भगवान् भक्त पर कृपा करता है तो यह नहीं देखता कि भक्त की इच्छा क्या है। अपितु अपनी इच्छा के अनुसार ही भक्त को देता है। पुराणों में इसे छलना, धोखा भी कहा गया है। चौथी उपेक्षा/द्वेष की स्थिति क्या अच्छावाक् की स्थिति कही जा सकती है? द्वेष से अर्थ है कि साधना में जो कष्ट प्राप्त होते हैं, उनसे हमें भय लगता है कि पता नहीं क्या होगा। न माया मिली न राम। इस प्रकार के भय की उपेक्षा का निर्देश है। द्वेष और उपेक्षा का दूसरा अर्थ यह हो सकता है कि जिस ऊर्जा को नियन्त्रित नहीं किया जा सकता, उसकी उपेक्षा करना ही श्रेष्ठ है। अच्छावाक् ऋत्विज के बारे में कहा जाता है कि अन्य ऋत्विज तो स्वर्ग को चले गए, अच्छावाक् रह गया। जब अग्नि के साथ इन्द्र ने सहयोग किया, तभी वह स्वर्ग जा पाया। इसका एक अर्थ यह हो सकता है कि किसी घटना को नाम-रूप के स्तर तक लाना बहुत कठिन कार्य है। फिर यदि नाम-रूप का प्राकट्य इसलिए हुआ हो कि हमारी देखने-विचार करने की शक्ति सीमित है तो वह भय उत्पन्न करेगा। उस नाम-रूप को बृहत्तर रूप में देखने की आवश्यकता है। यह अच्छावाक् का यक्ष से यश रूप में परिवर्तन होगा। इन्द्र का पूर्व रूप रुद्र होते हैं। जब रुद्र अवस्था शान्त हो जाएगी तो वह इन्द्र बन जाएगी। उपेक्षा शब्द को उप-ईक्षा रूप में, ईक्षण, विचार करने के रूप में भी समझा जा सकता है। इ अक्षर का रूपान्तरण य अक्षर में होकर यक्ष शब्द बन जाता है। य, र, ल, व अक्षरों को अर्धस्वर कहा जाता है। ऋ स्वर का रूपान्तर र में हो सकता है, लृ का ल में और उ का व में।

 

पुराणों में पुरुष के अंगों से ऋत्विजों की सृष्टि -- 

 

 

 

 

पद्म १.३९.७९

मत्स्य १६७.७

हरिवंश ३.१०.६

वक्त्र

ब्रह्मा, उद्गाता

ब्रह्मा, उद्गाता

ब्रह्मा, उद्गाता

बाहु

होता, अध्वर्यु

होता, अध्वर्यु

होता, अध्वर्यु, ग्रावस्तुत?, उन्नेता?

ब्रह्म

 

ब्राह्मणाच्छंसी

ब्राह्मणाच्छंसी

सर्व

ब्रह्मा?, ब्राह्मणाच्छंसी, स्तोतारौ(प्रस्तोता, ग्रावस्तुत)

प्रस्तोता

प्रस्तोता

मेढ्र

मैत्रावरुण, प्रतिप्रस्थाता

 

 

पृष्ठ

 

मित्रावरुणौ, प्रतिप्रस्थाता

 

 

 

 

मित्रावरुणौ, प्रतिप्रस्थाता

उदर

प्रतिहर्त्ता, पोता

प्रतिहर्त्ता, पोता

प्रतिहर्ता, पोता

पाणि

आग्नीध्र, उन्नेता

आग्नीध्र

आग्नीध्र, सुब्रह्मण्य

ऊरु

अच्छावाक्, सुब्रह्मण्य

अच्छावाक्, नेष्टा

अच्छावाक्, नेष्टा(मन-ऊरु से)

जानु

 

सुब्रह्मण्य

 

पाद

 

ग्रावस्तुत, उन्नेता

ग्रावस्तुत?, उन्नेता?

 

 

 

 

 

विभिन्न यज्ञों के ऋत्विजों के नाम--

 

 

देवीभागवत ३.१०.१८

देवीभागवत ११.२२.३१

पद्म १.३४.१३

ब्रह्माण्ड २.३.४७.४८

लक्ष्मीनारायण १.४४०.९६

लक्ष्मीनारायण १.५०९.२४

यजमान

देवदत्त

गृहस्थ

ब्रह्मा

परशुराम

धर्म

ब्रह्मा

आचार्य

 

 

 

 

अंगिरस, मार्कण्डेय

बृहस्पति

होता

बृहस्पति

वाक्

भृगु

विश्वामित्र

अत्रि, कश्यप

अग्नीध?, भरद्वाज, पराशर

मैत्रावरुण

 

 

वसिष्ठ

 

 

च्यवन

अच्छावाक्

 

 

क्रतु

 

 

 

ग्रावस्तुत

 

 

च्यवन

 

 

 

अध्वर्यु

याज्ञवल्क्य

चक्षु

पुलस्त्य

काश्यप

जमदग्नि, गौतम

पुलस्त्य

प्रतिप्रस्थाता

 

 

शिबि

 

भरद्वाज, वशिष्ठ

 

नेष्टा

 

 

बृहस्पति

 

 

 

उन्नेता

 

 

शांशपायन

 

 

रैभ्य

ब्रह्मा

सुहोत्र

मन

नारद

मार्कण्डेय

ब्रह्मा

नारद

ब्राह्मणाच्छंसी

 

 

गौतम

 

 

 

आग्नीध्र

 

श्रोत्र

देवल

 

 

 

पोता

 

 

देवगर्भ

 

 

 

उद्गाता

गोभिल

प्राण

आंगिरस

गौतम

नारद, वाल्मीकि(प्रेरितारं)

गोभिल

प्रस्तोता

पैल

 

पुलह(प्रत्युद्गाता)

 

 

 

प्रतिहर्त्ता

 

 

नारायण

 

 

शाण्डिल्य

सुब्रह्मण्य

 

 

अत्रि

 

 

अंगिरा

उपद्रष्टा

 

 

 

 

 

 

सदस्य

 

 

धर्म

 

 

 

शामित्र

 

 

भरद्वाज

 

 

 

अथर्वाक्

 

 

 

 

 

गालव

सत्रवीक्षक

 

 

 

 

 

गर्ग

 

 

 

 

 

 

स्कन्द ५.१.२८.७६

स्कन्द ५.१.६३.२४०

स्कन्द ५.३.१९४.५३

स्कन्द ६.५.५

स्कन्द ६.१८०.३२

स्कन्द ७.१.२३.९३

याग

राजसूय

वाजिमेध

नारायण विवाह

 

पुष्कर में अग्निष्टोम

प्रभास में -----

यजमान

सोम

बलि

विष्णु

त्रिशंकु

पितामह

सोम/ब्रह्मा

ऋत्विज

 

कश्यप

 

 

 

 

होता

अत्रि

भृगु

धर्म व वशिष्ठ

शाण्डिल्य

भृगु

गुरु

मैत्रावरुण

 

 

 

कार्मिक?

च्यवन

दुर्वासा

अच्छावाक्

 

 

 

भृगु

मरीचि

शाकल्य

ग्रावस्तुत

 

 

 

 

गालव

क्रतु

अध्वर्यु

भृगु

अत्रि

 

विश्वामित्र

पुलस्त्य

वसिष्ठ

प्रतिप्रस्थाता

 

 

 

 

अत्रि

शालंकायन

नेष्टा

 

 

 

अत्रि

रैभ्य

क्रथ

उन्नेता

 

 

 

गालव

सनातन

अंगिरा

ब्रह्मा

ब्रह्मा

पितामह

सनक

गौतम

नारद

नारद

ब्राह्मणाच्छंसी

 

 

 

पुलस्त्य

गर्ग

कौशिक

आग्नीध्र

 

 

 

च्यवन

भरद्वाज

मनु

पोता

 

 

 

गर्ग?

पाराशर?

शुक्र?

उद्गाता

हिरण्यगर्भ

नारद

अत्रि, अंगिरस, मरीचि

याज्ञवल्क्य

गोभिल

मरीचि

प्रस्तोता

 

 

 

शंकुवर्ण

कौथुम

कश्यप

प्रतिहर्त्ता

 

 

 

जैमिनि

शाण्डिल्य

गालव

सुब्रह्मण्य

 

 

 

 

अंगिरा

गर्ग

उपद्रष्टा

 

 

 

 

 

 

सदस्य

विष्णु

वसिष्ठ(सभासद)

सनत्कुमार इत्यादि

 

 

सनत्कुमार आदि/पुलह

 

 

 

अध्वर्यु पर टिप्पणी

 

आग्नीध्र पर टिप्पणी

 

उद्गाता पर टिप्पणी

 

उन्नेता पर टिप्पणी

 

नेष्टा पर टिप्पणी

 

होता पर टिप्पणी

 

प्रथम लेखन१६-४-२०१२ई.(वैशाख कृष्ण एकादशी, विक्रम संवत् २०६९)

 

संदर्भ

 

*देवान् ह यज्ञन्तन्वाना असुररक्षांस्यजिघांसन्। तेऽब्रुवन्, वामदेवं त्वं न इमं यज्ञं दक्षिणतो गोपायेति, मध्यतो वसिष्ठं, उत्तरतो भरद्वाजं, सर्वाननु विश्वामित्रम्। तस्मात् मैत्रावरुणो वामदेवान्न प्रच्यवते, वसिष्ठाद् ब्राह्मणाच्छंसी, भरद्वाजादच्छावाकः, सर्वे विश्वामित्रात्। - गोपथ ब्राह्मण २.३.२३

 

छान्दोग्य उपनिषद में वामदेव्यं साम(कया नश्चित्र आ भुवत् उती सदावृधः सखा इत्यादि) के लक्षणों में इसे प्रकृति व पुरुष के मिथुन के रूप में प्रदर्शित किया गया है। इसका अर्थ होगा कि प्रकृति की दक्षता में वृद्धि के लिए पुरुष इसमें अपना वीर्य स्थापित करता है। आज्य स्तोत्रों से प्रतीत होता है कि ब्राह्मणाच्छंसी ऋत्विज का स्थान पश्चिम दिशा, पाप नाश करने की दिशा होना चाहिए लेकिन गोपथ ब्राह्मण के उपरोक्त कथन में इसका स्थान मध्य में कहा जा रहा है। अच्छावाक् को भरद्वाज के साथ जोडना उपयुक्त ही है। भरद्वाज की प्रसिद्धि इसलिए है कि वह नाम-रूप को सत्य बना सकते हैं। जब राम वन से अयोध्या लौट रहे थे तो भरद्वाज ने अपने आश्रम से लेकर अयोध्या तक ऐसे वृक्ष बना दिए थे जिनमें बिना ऋतुओं के ही फल उत्पन्न हो गए थे।

 

*जगतीं होतुर् आज्ये। जागतो हि होता। सैषा भवति अग्न आ याहि वीतये इति। गायत्रीं मैत्रावरुणस्य। गायत्रो हि मैत्रावरुणः। सैषा भवति आ नो मित्रावरुणा इति। त्रिष्टुभं ब्राह्मणाच्छंसिनः। त्रैष्टुभो हि ब्राह्मणाच्छंसी। सैषा भवति आ याहि सुषुमा हि ते इति। अनुष्टुभम् अच्छावाकस्य। आनुष्टुभो ह्य् अच्छावाकः। तस्यैषा भवति इन्द्राग्नी आ गतं सुतम् इति। - जै.ब्रा. १.३१८-३१९

 

*अथो आहुर् एकम् एवैतत् स्तोत्रं सत् तच् चतुर्धा विहृत्य स्तुयुष् षड्भिर् एव होत्रे स्तुयुष्, षड्भिर् मैत्रावरुणाय, षड्भिर् ब्राह्मणाच्छंसिने, षड्भिर् अच्छावाकाय। - जै.ब्रा. २.१११

 

*पंचदशं ब्राह्मणाच्छंसिन आज्यं कुर्यात् तत्। ब्रह्म वै त्रिवृत्। क्षत्रं पंचदशः। तद् एतद् ब्रह्मणोभयतः क्षत्रं परिगृह्णाति। - जै.ब्रा. २.१७२

 

*तस्मिन्(अग्निष्टोमे) एता यथारूपं दक्षिणा नीयन्तेस्रग् उद्गातू, रुक्मो होतुः, प्राकाशाव् अध्वर्योर्, द्वादश पष्ठौहीर् ब्रह्मणे, धेनुर् मैत्रावरुणाय, ऋषभो ब्राह्मणाच्छंसिने, वाससी नेष्टापोत्रो, स्थूर् यवाचितम् अच्छावाकाय, अनड्वान् अग्नीधः। तद् यत् स्रग् उद्गातुर् भवति सौर्या वै स्रक्, सौर्य उद्गाता तत् तत्सलक्ष्म क्रियते।सा पटरणी भवति। पटरीव ह्य् असाव् आदित्यः। अथ यद् रुक्मो होतुर् भवति, त्रीणि वा एतानि सम्यञ्चि सन्धीयन्ते। रुक्म आहवनीयो ऽसाव् आदित्यः। - - - अथ यत् प्राकाशाव् अध्वर्योर् भवतो रूपेणेन्तताम् आह्वयन्तीति वा आहुः। - - -अथ यद् द्वादश पष्ठौहीर् ब्रह्मणे भवन्तिप्रजननं वै पष्ठौहीःप्रजननं ब्रह्मा तत् तत्सलक्ष्म क्रियते। अथ यद् धेनुर् मैत्रावरुणाय भवतिपयस्या वै धेनुःपयस्याभाजसौ मित्रावरुणौ तत् तत्सलक्ष्म क्रियते। अथ यद् ऋषभो ब्राह्मणाच्छंसिने भवत्य्ऐन्द्रो वै ब्राह्मणाच्छंस्य् ऐन्द्र ऋषभस् तत् तत्सलक्ष्म क्रियते। अथ यद् वाससी नेष्टापोत्रोर् भवतोमारुते वै वाससीमारुतौ नेष्टापोतारौ तत् तत्सलक्ष्म क्रियते। अथो भूमा वै मरुतो, भूमा तन्तुभिर् वासः। अथ यत् स्थूर् यवाचितम् अच्छावाकाय भवति, धीतेव ह वा एषा होत्रायातयाम्नी यद् अच्छावाकीया। ताम् एतैर् एव यवैर् आप्याययन्ति। तत् स्थूरि भवति क्षेमस्य रूपम्। होत्रा अनुविमुच्यान्ता इति। अथ यद् अनड्वान् अग्नीधे भवतिवहति वा अनड्वान्, वह्त्य् अग्निर् देवेभ्यो हविस्तत् तत्सलक्ष्म क्रियते। - जै.ब्रा. २.२०३

 

इस संदर्भ में ब्राह्मणाच्छंसी ऋत्विज को ऋषभ कहा गया है। पुराणों के अनुसार ब्रह्मा इस सृष्टि में पांच प्रकार से प्रवेश करता है स्थावरों में विपर्यय द्वारा, तिर्यकों/पशुओं में शक्ति के रूप में, मनुष्यों में सिद्धि के रूप में(ऋषि रूप) और देवों में तुष्टि-पुष्टि(भूख-प्यास से रहित) के रूप में। विपर्यय से तात्पर्य यह है कि क्रिस्टल आदि में दर्पण-सममिति होती है।

 

*तद् यत् त्रिवृद् भवति ब्रह्मणैव तत् समृद्ध्यन्ते। पञ्चदशं मैत्रावरुणस्य। क्षत्रं वै पञ्चदशः। अपभ्रंशो ह वै ब्रह्मणः क्षत्रम्। - - सप्तदशं ब्राह्मणाच्छंसिनः। प्रजापतिर् वै सप्तदशः। - - -षोडशम् अच्छावाकस्य। इन्द्रियं वै वीर्यं षोडशी। - जै.ब्रा. २.२२३

 

*सप्तदशं होतुः पृष्ठं भवति। प्रजापतिर् वै सप्तदशः। - - एकविंशं मैत्रावरुणस्य। - - -त्रिणवं ब्राह्मणाच्छंसिनः। - - षोडशम् अच्छावाकस्य। जै.ब्रा. २.२२४

 

*महाव्रतम् अध्वर्युस् त्रिवृता शीर्ष्णा गायत्रेण स्तोष्यन्न् अग्रेण हविर्धाने उपविशति, मैत्रावरुणः पञ्चदशेन पक्षेण बृहता स्तोष्यन् दक्षिणत उपविशति, ब्राह्मणाच्छंसी सप्तदशेन पक्षेण रथन्तरेण स्तोष्यन्न् उत्तरत उपविशति, नेष्टैकविंशेन पुच्छेन भद्रेण स्तोष्यन् पत्नीनां मध्य उपविशति, उद्गाता पञ्चविंशेनात्मना राजनेन स्तोष्यन्न् औदुम्बरीम् अधिरोहत्य्- - -। - जै.ब्रा. २.४०६

 

*अध्वर्युस् त्रिवृता शीर्ष्णा गायत्रेणोद्गायति। इदं तच् छिरः प्रतिदधाति। - - - मैत्रावरुणः पञ्चदशपक्षेण बृहतोद्गायति। इमं तद् बाहुं प्रतिदधाति।तस्माद् अयं बाहुः प्रतिहितः। पराचीभिर् पुनरभ्यावर्तम्। तस्माद् इदं बाहुं सं चाञ्चति प्र च सारयति। - - - ब्राह्मणाच्छंसी सप्तदशेन पक्षेण रथन्तरेणोद्गायति। इमं तं बाहुं प्रतिदधाति। तस्माद् अयं बाहुः प्रतिहितः पराचीभिर् अपुनरभ्यावर्तम्। - - - नेष्टैकविंशेन पुच्छेन भद्रेणोद्गायति। इदं तत् पुच्छं प्रतिदधाति।  - - - -। उद्गाता पञ्चविंशेनात्मना राजनेनोद्गायति। इमं तद् आत्मानं प्रतिदधाति। - जै.ब्रा. २.४०७

 

*छन्दांसि यद् अयजन्त तेषां बृहत्य् एवोदगायत्। अथ याव् एता उत्तरौ प्रगाथौ तौ प्रस्तोतृप्रतिहर्ताराव् आस्ताम्। अमितच्छन्दो गृहपतिर्, विराड् ब्रह्म, गायत्री मैत्रावरुणा, जगती होता, पंक्तिर् अध्वर्युः। तस्य यत् पञ्चमं पदं स प्रतिप्रस्थाता, त्रिष्टुब् ब्राह्मणाच्छंस्य, उष्णिक्ककुभौ छन्दसी नेष्टापोताराव्, अनुष्टुब् अच्छावाको, द्विपदोन्नेता, अक्षरपंक्तिर् ग्रावस्तुद्, एकपदा सुब्रह्मण्यो, ऽतिच्छन्दा आग्नीध्रः। - जै.ब्रा. ३.३६९

 

*शाक्वरं मैत्रावरुणस्य वैरूपं ब्राह्मणाच्छंसिनो रैवतमच्छावाकस्य त एतं त्रयोदशमधिचरं मासमाप्नुवन्ति शांखायन ब्राह्मण २५.११

 

*ग्रावस्तुत् का वृत्तान्त ऐ.ब्रा. ६.१

 

*सुब्रह्मण्य का वृत्तान्त ऐ.ब्रा. ६.३

 

*- - - मित्रावरुणाभ्यां हि देवा दक्षिणतः प्रातःसवनेऽसुररक्षांस्यपाघ्नते। - - - इन्द्रेणैव मध्यतः प्रातःसवनेऽसुररक्षांस्यपघ्नते, तस्मादैन्द्रं ब्राह्मणाच्छंसी प्रातःसवने शंसति - - - इन्द्राग्निभ्यामेवोत्तरतः प्रातःसवनेऽसुररक्षांस्यपघ्नते तस्मादैन्द्राग्नमच्छावाकः प्रातःसवने शंसति - - -अग्निनैव पुरस्तात् प्रातःसवनेऽसुररक्षांस्यपघ्नते, तस्मादाग्नेयं प्रातःसवनम्। - - -विश्वैरेव देवैरात्मभिः पश्चात् तृतीयसवनेऽसुररक्षांस्यपघ्नते, तस्माद् वैश्वदेवं तृतीयसवनम्। - ऐ.ब्रा. ६.४

 

*अथात आरम्भणीया एव। ऋजुनीति नो वरुण इति मैत्रावरुणस्य, मित्रो नयतु विद्वानिति, प्रणेता वा एष होत्रकाणां यन्मैत्रावरुणस्तस्मादेषा प्रणेतृमती भवति। इन्द्रं वो विश्वतस्परीति ब्रह्मणाच्छंसिनो हवामहे जनेभ्य इतीन्द्रमेवैतयाऽहरहर्निह्वयन्ते। न हैषां विहवेऽन्य इन्द्रं वृङ्क्ते, यत्रैवं विद्वान् ब्राह्मणाच्छंस्येतामहरहः शंसति। यत्सोम आ सुते नर इत्यच्छावाकस्येन्द्राग्नी अजोहवुरितीन्द्राग्नी ऐवैतयाऽहरहर्निह्वयन्ते, न हैषां विहवेऽन्य इन्द्राग्नी वृङ्क्ते, यत्रैवं विद्वानच्छावाक एतानहरहः शंसति। - ऐ.ब्रा. ६.६

 

*अथात परिधानीया(शस्त्र समाप्तिसाधनभूता ऋचः) एव। ते स्याम देव वरुणेति(ऋ. ७.६६.९) मैत्रावरुणस्येषं स्वश्च धीमहीत्ययं वै लोक इषमित्यसौ लोकः स्वरित्युभावेवैतया लोकावारभन्ते। व्यन्तरिक्षमतिरदिति(ऋ. ८.१४.७) ब्राह्मणाच्छंसिनो विवत्तृचं स्वर्गमेवैभ्य एतया लोकं विवृणोति। मदे सोमस्य रोचना, इन्द्रो यदभिनद्वलमिति। सिषासवो वा एते यद्दीक्षितास्तस्मादेषा वलवती भवति। उद्गा आजदङ्गिरोभ्य आविष्कृण्वन् गुहा सतीः, अर्वाञ्चं नुनुदे वलमिति (ऋ. ८.१४.८) सनिमेवैभ्य एतयाऽवरुन्धे। इन्द्रेण रोचना दिव इति(ऋ. ८.१४.९) स्वर्गो वै लोक इन्द्रेण रोचना दिवः। दृळ्हानि दृंहितानि च स्थिराणि न पराणुद इति। स्वर्ग एवैतया लोकेऽरहः प्रतितिष्ठन्तो यन्ति। आऽहं सरस्वतीवतोरित्यच्छावाकस्य, वाग्वै सरस्वती, वाग्वतोरिति हैतदाहेन्द्राग्न्योरवो वृणं इत्यैतद्ध वा इन्द्राग्न्योः प्रियं धाम यद्वागिति, प्रियेणैवैनौतद्धाम्ना समर्धयति। - ऐ.ब्रा. ६.७

 

*उभय्यः परिधानीया भवन्ति होत्रकाणां, प्रातःसवने च माध्यंदिने चाहीनाश्चैकाहिकाश्च। तत ऐकाहिकाभिरेव मैत्रावरुणः परिदधाति, तेनास्माल्लोकान्न प्रच्यवते। अहीनाभिरच्छावाकः स्वर्गस्य लोकस्याऽऽप्त्यै। उभयीभिर्ब्राह्मणाच्छंसी, तेनो स उभौ व्यन्वारभमाण एतीमं चामुं च लोकमथो मैत्रावरुणं चाच्छावाकं चाथो अहीनं चैकाहं चाथो संवत्सरं चाग्निष्टोमं चैवमु स उभौ व्यन्वारभमाण एति। - ऐ.ब्रा. ६.८

 

*अथाह यदैन्द्रो वै यज्ञोऽथ कस्माद् द्वावेव प्रातःसवने प्रस्थितानां प्रत्यक्षादैन्द्रीभ्यां यजतो होता चैव ब्राह्मणाच्छंसी च इदं ते सोम्यं मध्विति होता यजतीन्द्र त्वा वृषभं वयमिति ब्राह्मणाच्छंसी, नानादेवत्याभिरितरे, कथं तेषामैन्द्र्यो भवन्तीति। मित्रं वयं हवामह इति मैत्रावरुणो यजति, वरुणं सोमपीतय इति, यद्वै किंच पीतवत् पदं, तदैन्द्रं रूपं, तेनेन्द्रं प्रीणाति। मरुतो यस्य हि क्षय इति पोता यजति, स सुगोपातमो जन इतीन्द्रो वै गोपास्तदैन्द्रं रूपं, तेनेन्द्रं प्रीणाति। अग्ने पत्नीरिहा वहेति नेष्टा यजति, त्वष्टारं सोमपीतय इतीन्द्रो वै त्वष्टा, तदैन्द्रं रूपं, तेनेन्द्रं प्रीणाति। उक्षान्नाय वशान्नायेत्याग्नीध्रो यजति, सोमपृष्ठाय वेधस इतीन्द्रो वै वेधास्तदैन्द्रं रूपं, तेनेन्द्रं प्रीणाति। प्रातर्यावभिरा गतं देवेभिर्जेन्यावसू, इन्द्राग्नी सोमपीतय इति स्वयं समृद्धाऽच्छावाकस्य। - ऐ.ब्रा. ६.१०

 

*ते(ऋत्विजः) वै खलु सर्व एव माध्यन्दिने प्रस्थितानां प्रत्यक्षादैन्द्रीभिर्यजन्ति। अभितृण्णवतीभिरेके। पिबा सोममभि यमुग्र तर्द इति(ऋ. ६.१७.१) होता यजति।स ईं पाहि य ऋजीषी तरुत्र इति (ऋ. ६.१७.२) मैत्रावरुणो यजति। एवा पाहि प्रत्नथा मन्दतु त्वा इति(ऋ. ६.१७.३) ब्राह्मणाच्छंसी यजति। अर्वाङेहि सोमकामं त्वाहुरिति(ऋ. १.१०४.९) पोता यजति। इन्द्राय सोमाः प्रदिवो विदाना इति(ऋ. ३.३६.२) अच्छावाको यजति। तासामेता अभितृण्णवत्यो भवन्ति - - - ऐ.ब्रा. ६.११

 

*अथाह यदैन्द्रार्भवं वै तृतीयसवनमथ कस्मादेष एव तृतीयसवने प्रस्थितानां प्रत्यक्षादैन्द्रार्भव्या यजतीन्द्र ऋभुभिर्वाजवद्भिः समुक्षितमिति होतैव, नानादेवत्याभिरितरे, कथं तेषामैन्द्रार्भव्यो भवन्तीति। इन्द्रावरुणा सुतपाविमं सुतमिति मैत्रावरुणो यजति, युवो रथो अध्वरं देववीतय इति बहूनि वाऽह तदृभूणां रूपम्। इन्द्रश्च सोमं पिबतं बृहस्पत इति ब्राह्मणाच्छंसी यजत्या वां विशन्त्विन्दवः स्वाभुव इति बहूनि वाह तदृभूणां रूपम्। आ वो वहन्तु सप्तयो रघुष्यद इति पोता यजति, रघुपत्वानः प्र जिगात बाहुभिरिति बहूनि वाह तदृभूणां रूपम्। अमेव नः सुहवा आ हि गन्तनेति नेष्टा यजति, गन्तनेति वाह तदृभूणां रूपम्। इन्द्राविष्णू पिबतं मध्वो अस्येत्यच्छावाको यजत्या वामन्धांसि मदिराण्यग्मन्निति बहूनि वाह तदृभूणां रूपम्। इमं स्तोममर्हते जातवेदस इत्याग्नीध्रो यजति, रथमिव सं महेमा मनीषयेति बहूनि वाह तदृभूणां रूपम्। - ऐ.ब्रा. ६.१२

 

*अथाऽऽह यद्द्व्युक्थो होता(प्रातःसवन में आज्य एवं प्रउग शस्त्र, माध्यन्दिन सवन में मरुत्वतीय एवं निष्केवल्य शस्त्र, तृतीय सवन में वैश्वदेव एवं अग्निमारुत शस्त्र), कथं होत्रका द्व्युक्था भवन्तीति। यदेव द्विदेवत्याभिर्यजन्तीति ब्रूयात् तेनेति। - ऐ.ब्रा. ६.१३

 

*अथाऽऽह यदेतास्तिस्र उक्थिन्यो होत्राः, कथमितरा उक्थिन्यो भवन्तीति। आज्यमेवाऽऽग्नीध्रीयाया उक्थं, मरुत्वतीयं पौत्रीयायै, वैश्वदेवं नेष्ट्रीयायै, ता वा एता होत्रा एवं न्यङ्गा एव भवन्ति। अथाऽऽह यदेकप्रैषा अन्ये होत्रका अथ कस्माद् द्विप्रैषः पोता, द्विप्रैषो नेष्टेति। यत्रादो गायत्री सुपर्णो भूत्वा सोममाहरत्, तदेतासां होत्राणामिन्द्र उक्थानि परिलुप्य होत्रे प्रददौ, यूयं माऽभ्यह्वयध्वं, यूयमस्यावेदिष्टेति, ते होचुर्देवा वाचेमे होत्र प्रभावयामेति, तस्मात्ते द्विप्रैषे भवत ऋचाऽग्नीध्रीयां प्रभावयांचक्रुस्तस्मात् तस्यैकयर्चा भूयस्यो याज्या भवन्ति। अथाऽऽह यद्धोता यक्षद्धोता यक्षदिति मैत्रावरुणो होत्रे प्रेष्यत्यथ कस्मादहोतृभ्यः सद्भ्यो होत्राशंसिभ्यो होता यक्षद्धोता यक्षदिति प्रेष्यतीति। प्राणो वै होता, प्राणः सर्व ऋत्विजः, प्राणो यक्षत्, प्राणो यक्षदित्येव तदाह। अथाहास्त्युद्गातॄणां प्रैषा३, नाँ३ इति। अस्तीति ब्रूयाद्, यदेवैतत्प्रशास्ता जपं जपित्वा स्तुध्वमित्याह, स एषां प्रैषः। अथाहास्त्यच्छावाकस्य प्रवरा३, नाँ३ इति। अस्तीति ब्रूयाद्, यदेवैनमध्वर्युराहाच्छावाक वदस्व यत्ते वाद्यमित्येषोऽस्य प्रवरः। अथाह यदैन्द्रावरुणं मैत्रावरुणस्तृतीयसवने शंसत्यथ कस्मादस्याऽऽग्नेयौ स्तोत्रियानुरूपौ भवत इत्यग्निना वै मुखेन देवा असुनानुक्थेभ्यो निर्जघनुस्तस्मादस्याऽऽग्नेयौ स्तोत्रियानुरूपौ भवतः। अथाऽऽह यदैन्द्राबार्हस्पत्यं ब्राह्मणाच्छंसी तृतीयसवने शंसत्यैन्द्रावैष्णवमच्छावाकः, कथमेनयोरैन्द्राः स्तोत्रियानुरूपा भवन्तीतीन्द्रो ह स्म - - - -- ऐ.ब्रा. ६.१४

 

*अथाह यज्जागतं वै तृतीयसवनमथ कस्मादेषां त्रिष्टुभः परिधानीया भवन्तीति, वीर्यं वै त्रिष्टुब्वीर्यं एव तदन्ततः प्रतितिष्ठन्तो यन्ति। इयमिन्द्रं वरुणमष्टमे गीरिति मैत्रावरुणस्य, बृहस्पतिर्नः परिपातु पश्चादिति ब्राह्मणाच्छंसिन, उभा जिग्युरित्यच्छावाकस्य।- - -ऐ.ब्रा. ६.१५

 

*अथाह यज्जागतं वै तृतीयसवनमथ कस्मादेषां त्रिष्टुभः परिधानीया भवन्तीति, वीर्यं वै त्रिष्टुब्वीर्यं एव तदन्ततः प्रतितिष्ठन्तो यन्ति। इयमिन्द्रं वरुणमष्टमे गीरिति(ऋ.७.८४.५) मैत्रावरुणस्य, बृहस्पतिर्नः परिपातु पश्चादिति(ऋ. १०.४२.११) ब्राह्मणाच्छंसिन, उभा जिग्यथुरिति(ऋ. ६.६९.८) अच्छावाकस्य। उभौ हि तौ जिग्यतुः। न पराजयेथे न पराजिग्य इति। न हि तयोः कतरश्चन पराजिग्ये।इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्रं वि तदैरयेथामिति। - - - ऐरयेथामैरयेथामित्यच्छावाक उक्थ्येऽभ्यस्यति, स हि तत्रान्त्यो भवति। अग्निष्टोमे होताऽतिरात्रे च, स हि तत्रान्त्यो भवति।- - - ऐ.ब्रा. ६.१५

 

*अथाह यन्नाराशंसं वै तृतीयसवनमथ कस्मादच्छावाकोऽन्ततः शिल्पेष्वनाराशंसीः शंसतीति। विकृतिर्वै नाराशंसं किमिव च वै किमिव च रेतो विक्रियते, तत्तदा विकृतं प्रजातं भवति अथैतन्मृद्विवच्छन्दः शिथिरं यन्नाराशंसमथैषोऽन्त्यो यदच्छावाकस्तद्दृळ्हतायै दृळ्हे प्रतिष्ठास्याम इति। - ऐ.ब्रा. ६.१६

 

*त एते प्रातःसवने षळहस्तोत्रियाञ्छस्त्वा माध्यन्दिनेऽहीनसूक्तानि शंसन्ति। तान्येतान्यहीनसूक्तान्या सत्यो यातु मघवाँ ऋजीषीति(ऋ. ४.१६) सत्यवन् मैत्रावरुणो, ऽस्मा इदु प्र तवसे तुराय(ऋ. १.६१) इन्द्राय ब्रह्माणि राततमा। इन्द्रब्रह्माणि गोतमासो अक्रन्निति ब्रह्मण्वद् ब्राह्मणाच्छंसी, शासद्वह्निर्जनयन्त वह्निमिति(ऋ.३.३१) वह्निवदच्छावाकः। - - - ऐ.ब्रा. ६.१८

 

*ततो वा एतांस्त्रीन् संपातान् मैत्रावरुणो विपर्यासमेकैकमहरहः शंसति। एवा त्वामिन्द्र वज्रिन्नत्रेति(ऋ. ४.१९) प्रथमेऽहनि, यन्न इन्द्रो जुजुषे यच्च वष्टीति(ऋ. ४.२२) द्वितीये, कथा महामवृधत् कस्य होतुरिति(ऋ. ४.२३) तृतीये। त्रीनेव संपातान् ब्राह्मणाच्छंसी विपर्यासमेकैकमहरहः शंसतीन्द्रः पूर्भिदातिरद्दासमर्कैरिति(ऋ. ३.३४) प्रथमेऽहनि, य एक इद्धव्यश्चर्षणीनामिति(ऋ. ६.२२) द्वितीये, यस्तिग्मशृङ्गो वृषभो न भीम इति(ऋ. ७.१९) तृतीये। त्रीनेव संपातानच्छावाको विपर्यासमेकैकमहरहः शंसतीमामू षु प्रभृतिं सातये धा इति(ऋ. ३.३६) प्रथमेऽहनीच्छन्ति त्वा सोम्यासः सखाय इति(ऋ. ३.३०) द्वितीये, शासद्वह्निर्दुहितुर्नप्त्यङ्गादिति (ऋ. ऋ. ३.३१) तृतीये। - ऐ.ब्रा. ६.१९

 

*अथ यान्यहानि महास्तोमानि स्युः, को अद्य नर्यो देवकाम इति(ऋ. ४.२५) मैत्रावरुण आवपेत, वने न वायो न्यधायि चाकन्निति(ऋ. १०.२९) ब्राह्मणाच्छंस्या याह्यर्वाङुप बन्धुरेष्ठा इति(ऋ. ३.४३) अच्छावाकः। - ऐ.ब्रा. ६.१९

 

*सद्यो ह जातो वृषभः कनीन इति(ऋ. ३.४८) मैत्रावरुणः पुरस्तात् सूक्तानामहरहः शंसति। - - - -उदु ब्रह्माण्यैरत श्रवस्येति(ऋ. ७.२३?) ब्राह्मणाच्छंसी ब्रह्मण्वत् समृद्धं सूक्तमहरहः शंसति। - - - -अभितष्टेव दीधया मनीषाम् इति(ऋ. ३.३८) अच्छावाकोऽहरहः शंसत्यभिवत् तत्यै रूपम्। - ऐ.ब्रा. ६.२०

 

*अप प्राच इन्द्र विश्वाँ अमित्रानिति(ऋ. १०.१३१.१) मैत्रावरुणः पुरस्तात् सूक्तानामहरहः शंसति। - - - अभयस्य रूपमभयमिव हि यन्निच्छति। ब्रह्मणा ते ब्रह्मयुजा युनज्मीति(ऋ. ३.३५.४)ब्राह्मणाच्छंस्यहरहः शंसति, युनज्मीति युक्तवती - - - उरुं नो लोकमनु नेषि विद्वानिति(ऋ. ६.४७.८) अच्छावाकोऽहरहः शंसत्यनु नेषीत्येतीव ह्यहीनोऽहीनस्य रूपम्। - ऐ.ब्रा. ६.२२

 

*पृष्ठ्यषडह षष्ठमहः तथैवैतद् यजमानाः प्रातःसवने नभाकेन वलं नभयन्ति, ते यन्नभयन्ती३ श्रथयन्त्येवैनं तत्, तस्माद्धोत्रकाः प्रातःसवने नाभाकांस्तृचाञ्छंसन्ति। यः ककुभो निधारय इति(ऋ. ८.४१.४-६) मैत्रावरुणः, पूर्वीष्ट इन्द्रोपमातय इति(ऋ. ८.४०.९-११) ब्राह्मणाच्छंसी, ता हि मध्यं भराणामिति(ऋ. ८.४०.३-५) अच्छावाकः। - ऐ.ब्रा. ६.२४

 

*पृष्ठ्यषडहस्य षष्ठेऽहनि शिल्पनामकानि शस्त्राणि नाभानेदिष्ठं(ऋ. १०.६१.१-२७)(होता) शंसति। रेतो वै नाभानेदिष्ठो रेतस्तत्सिञ्चति। - - - - वालखिल्याः (ऋ. ८.४९-८.  ) (मैत्रावरुणः) शंसति, प्राणा वै वालखिल्याः प्राणानेवास्य तत्कल्पयति। ता विहृताः शंसति, विहृता वा इमे प्राणाः - - - - - - । सुकीर्तिं(ऋ. १०.१३१.१-७) (ब्राह्मणाच्छंसी) शंसति, देवयोनिर्वै सुकीर्तिस्तद् यज्ञाद्देवयोन्यै यजमानं प्रजनयति। वृषाकपिं शंसत्यात्मा वै वृषाकपिरात्मानमेवास्य तत्कल्पयति। - - -तं ब्राह्मणाच्छंसी जनयित्वाऽच्छावाकाय संप्रयच्छत्येतस्य त्वं प्रतिष्ठां कल्पयेति। एवयामरुतं(ऋ. ५.८७.१-९)(अच्छावाकः) शंसति, प्रतिष्ठा वा एवयामरुत्प्रतिष्ठामेवास्य तत्कल्पयति। - - - ऐ.ब्रा. ६.२७-६.३०

 

*तदाहुर्यदस्मिन् विश्वजित्यतिरात्र एवं षष्ठेऽहनि कल्पते यज्ञः, कल्पते यजमानस्य प्रजातिः, कथमत्राशस्त एव नाभानेदिष्ठो भवत्यथ मैत्रावरुणो वालखिल्याः शंसति, ते प्राणा, रेतो वा अग्रेऽथ प्राणाः, एवं ब्राह्मणाच्छंस्यशस्त एव नाभानेदिष्ठो भवत्यथ वृषाकपिं शंसति, स आत्मा, रेतो वा अग्रेऽथाऽऽत्मा, कथमत्र यजमानस्य प्रजातिः, कथं प्राणा अविक्लृप्ता भवन्तीति। - ऐ.ब्रा. ६.३१

 

*अथातः पशोर्विभक्तिः, तस्य विभागं वक्ष्यामः। हनू सजिह्वे प्रस्तोतुः, श्येनं वक्ष उद्गातुः, कण्ठः काकुद्रः प्रतिहर्तुर्दक्षिणा श्रोणिर्होतु, सव्या ब्रह्मणो, दक्षिणं सक्थि मैत्रावरुणस्य सव्यं ब्राह्मणाच्छंसिनो, दक्षिणं पार्श्वं सांसमध्वर्योः, सव्यमुपगातॄणां, सव्योंऽसः प्रतिप्रस्थातुर्, दक्षिणं दोर्नेष्टुः, सव्यं पोतुर्, दक्षिण ऊरुरच्छावाकस्य, सव्य आग्नीध्रस्य, दक्षिणो बाहुरात्रेयस्य, सव्यः सदस्यस्य, सदं चानूकं च गृहपतेर्, दक्षिणौ पादौ गृहपतेर्व्रतप्रदस्य, सव्यौ पादौ गृहपतेर्भार्यायै व्रतप्रदस्यौष्ठ एनयोः साधारणो भवति, तं गृहपतिरेवं प्रशिंष्याज्जाघनीं  पत्नीभ्यो हरन्ति, तां ब्राह्मणाय दद्युः, स्कन्ध्याश्च मणिकास्तिस्रश्च कीकसा ग्रावस्तुतस्, तिस्रश्चैव कीकसा अर्धं च वैकर्तस्योन्नेतुरर्धं चैव वैकर्तस्य, क्लोमा च शमितुस्तद्ब्राह्मणाय दद्याद् यद्यब्राह्मणः स्याच्छिरः सुब्रह्मण्यायै, यः श्वःसुत्यां प्राह तस्याजिनमिळा सर्वेषां होतुर्वा। ता वा एताः षट्त्रिंशतमेकपदा यज्ञं वहन्ति, षट्त्रिशदक्षरा वै बृहती ऐ.ब्रा. ७.१

 

*हरिश्चन्द्रस्य राजसूयानुष्ठानम् तस्य ह विश्वामित्रो होताऽऽसीज्जमदग्निरध्वर्युर्वसिष्ठो ब्रह्माऽयास्य उद्गाता, तस्मा उपाकृताय नियोक्तारं न विविदुः, स होवाचाजीगर्तः सौयवसिर्मह्यमपरं शतं दत्ताहमेनं नियोक्ष्यामीति - - - ऐ.ब्रा. ७.१६

 

*आज्यानां प्रथमा(विष्टुतिः) पृष्ठानां द्वितीयोक्थानां तृतीया। याज्याना ँ सा होतुर्य्या पृष्ठाना ँ सा मैत्रावरुणस्य योक्थाना ँ सा ब्राह्मणाच्छ ँसिनो यैव होतुः साछावाकस्य या पृष्ठाना ँ सा होतुर्य्योक्थाना ँ सा मैत्रावरुणस्य याज्याना ँ सा ब्राह्मणाच्छ ँसिनो यैव होतुः साछावाकस्य योक्थाना ँ सा हुतुर्य्याज्याना ँ सा मैत्रावरुणस्य या पृष्ठाना ँ सा ब्राह्मणाछ ँसिनो यैव होतुः साछावाकस्य, सर्वा आज्येषु सर्वाः पृष्ठेषु सर्व्वा उक्थेषु। - ताण्ड्य ब्राह्मण ३.११.३

 

*महाव्रतम् त्रिवृछिरो भवति। - - -पञ्चदशसप्तदशौ पक्षौ भवतः पक्षाभ्यां वै यजमानो वयो भूत्वा स्वर्गं लोकमेति। - - - दक्षिणतो बृहत्कार्यं दक्षिणोवा अर्द्ध आत्मनो वीर्य्यवत्तरः। अथो खल्वाहुरुत्तरत एव कार्य्यं ब्राह्मणाछ ँसिनोऽर्द्धात् त्रैष्टुभं वै बृहत्त्रैष्टुभो ब्राह्मणाच्छ ँसी त्रैष्टुभः पञ्चदशस्तोमः। दक्षिणतो रथन्तरं कार्य्यम्मैत्रावरुणस्यार्द्धाद्गायत्रं वै रथन्तरं गायत्रो मैत्रावरुणो गायत्रः सप्तदश स्तोमः। एकवि ँशं पुच्छं भवति।- - यज्ञायज्ञ४यं पुच्छं कार्य्यं  - तां.ब्रा. ५.१.१४

 

*महाव्रतम् अद्ध्वर्युः शिरसोद्गायेन्मैत्रावरुणो दक्षिणेन पक्षेण ब्राह्मणाछ ँस्युत्तरेण गृहपतिः पुछेनोद्गातात्मना। हविर्द्धाने शिरसा स्तुत्वा स ँरब्धाः प्रत्यञ्च एयुस्ते दक्षिणेन धिष्ण्यान् परीत्य पश्चान्मैत्रावरुणस्य धिष्ण्यस्योपविश्य रथन्तरेण पञ्चदशेन स्तुवीर ँस्त उदञ्चः स ँसर्पेयुर्जघनेन होतुर्धिष्ण्यं पश्चाद्ब्राह्मणाच्छ ँसिनो धिष्ण्यस्योपविश्य बृहता सप्तदशेन स्तुवीर ँस्ते येनैव प्रसर्पेयुस्तेन पुनर्निःसृप्योत्तरेणाघ्नीध्रं परीत्य पश्चाद्गार्हपत्यस्योपविश्य पुच्छेनैकवि ँशेन स्तुवीर ँस्ते येनैव निःसर्पेयुस्तेन पुनः प्रसृप्य यथायतनमुपविश्यासन्दीमारुह्योद्गातात्मनोद्गायति। - तां.ब्रा. ५.६.७

 

*दशपेयः -- यद्भार्गवो होता भवति तेनैव तदिन्द्रियं वीर्य्यमाप्त्वावरुन्धे यत् श्रायन्तीयं ब्रह्मसाम भवति तेनैव तदिन्द्रियं वीर्य्यमाप्त्वावरुन्धे यत् पुष्करस्रजं प्रतिमुञ्चते तेनैव तदिन्द्रियं वीर्य्यमाप्त्वावरुन्धे। - तां.ब्रा. १८.९.२  

 

*स्रगुद्गातुस्सौर्य्य उद्गाता न वै तस्मै व्यौछदथो व्येवास्मै वासयति। रुक्मोहोतुराग्नेयो होताथो अमुमेवास्मा आदित्यमुन्नयति। प्राकाशावध्वर्य्योर्य्यमाविव ह्यध्वर्य्यू अथो चक्षुषी एवास्मिन् दधाति। अश्वः प्रस्तोतुः प्राजापत्योऽश्वः प्राजापत्यः प्रस्तोताथो प्रेव ह्यश्वः प्रोथति प्रेव प्रस्तोता स्तौति। धेनुः प्रतिहर्त्तुः पय एवास्मिन् दधाति। वशा मैत्रावरुणस्य वशम्मा नयादिति। ऋषभो ब्राह्मणाच्छ ँसिनो वीर्य्यं वा ऋषभो वीर्य्यमेवास्मिन् दधाति। वासः पोतुः पवित्रत्वाय। वरासी नेष्टुरनुलम्बेव ह्येषा होत्रा। स्थूरियवाचितमच्छावाकस्य स्थूरिरिव ह्येषा होत्राथोनिर्व्वरुणत्वायैव यवा न वै तर्हि सदस्यां दक्षिणा अभ्यभवन् - - । अनड्वानग्नीधोयुक्त्यै। अजः सुब्रह्मण्यायै। वत्सतर्य्युन्नेतुः साण्डः स्त्रिवत्सो ग्रावस्तुतोमिथुनत्वाय। द्वादशपष्ठौह्यो गर्भिण्यो ब्रह्मणो - - - -यद्गर्भिर्ण्यो वाग्वै धेनुर्म्मन्त्रो गर्भो - - - तां.ब्रा. १८.९.२१

 

*अभिजिदतिरात्रम् त्रिवृत् बहिष्पवमानं पञ्चदश ँ होतुराज्य ँ सप्तदशम्मैत्रावरुणस्य पञ्चदशं ब्राह्मणाछ ँसिनः सप्तदशमछावाकस्यैकविंशो माध्यन्दिनः पवमानः सप्तदशं होतुःपृष्ठमेकवि ँशमछावाकस्य त्रिणव आर्भवस्त्रयस्त्रि ँशोऽग्निष्टोमः प्रत्यवरोहीण्युक्थानि - - - तां.ब्रा. २०.८.१

 

*विश्वजिदतिरात्रम् त्रिवृत् बहिष्पवमानं पञ्चदश ँ होतुराज्य ँ सप्तदशम्मैत्रावरुणस्यैकवि ँशं ब्राह्मणाच्छ ँसिनः पञ्चदशमछावाकस्य सप्तदशो माध्यन्दिनः पवमान एकवि ँशं होतुः पृष्ठं त्रिणवम्मैत्रावरुणस्य सप्तदशं ब्राह्मणाछ ँसिन एकवि ँशमछावाकस्य त्रिणव आर्भवस्त्रयस्त्रि ँशोऽग्निष्टोमः प्रत्यवरोहीण्युक्थानि - - - तां.ब्रा. २०.९.१

 

*कुण्डपायिनामयनम् यो होता सोध्वर्युः स पोता य उद्गाता स नेष्टा सोच्छावाको यो मैत्रावरुणः स ब्रह्मा स प्रतिहर्त्ता यः प्रस्तोता स ब्राह्मणाच्छ ँसी स ग्रावस्तुद्यः प्रतिप्रस्थाता सोग्नीत्स उन्नेता गृहपतिर्गृहपतिः सुब्रह्मण्यः सुब्रह्मण्यः। - तां.ब्रा. २५.४.५

 

*सर्पाणां सत्रम् जर्व्वरो गृहपतिर्धृतराष्ट्र ऐरावतो ब्रह्मा पृथुश्रवादौरे श्रवस उद्गाता ग्लावश्चाजगावश्च प्रस्तोतृप्रतिहर्त्तारौ दत्तस्तापसो होता शितिपृष्ठो मैत्रावरुणस्तक्षको वैशालेयो ब्राह्मणाछ ँसी शिखानुशिखौ नेष्टापौतारौ अरुण आटोछावाकस्तिमिर्घोदौरे श्रुतोग्नीत् कौतस्तावध्वर्यु अरिमेजयश्च जनमेजयश्चार्व्वुदो ग्रावस्तुदजिरः सुब्रह्मण्यश्च कपिशंगावुन्नेतारौ षण्डकुषण्डावभिगरापगरौ। - तां.ब्रा. २५.१५.३

 

*विश्वसृजामयनम् तपो गृहपतिर्ब्रह्म ब्रह्मेरापत्न्यमृतमुद्गाता भूतं प्रस्तोता भविष्यत्प्रतिहर्त्तार्त्तव उपगातार आर्त्तवाः सदस्याः सत्य ँ होतर्त्तम्मैत्रावरुण उजोब्राह्मणाछ ँसी त्विषिश्चापचितिश्च नेष्टापोतारौ यशोछावाकोग्निरेवाग्नीद्भगो ग्रावस्तुदूर्गुन्नेता वाक्सुब्रह्मण्यः प्राणोध्वर्य्युरपानः प्रतिप्रस्थाता - - - -तां.ब्रा. २५.१८.४

 

*उक्थग्रहः मित्रावरुणाभ्यां त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामि(वा.सं. ७.२३) इत्येव मैत्रावरुणाय। - - - -इन्द्राय त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामि(वा.सं. ७.२३) इत्येव ब्राह्मणाच्छंसिने. ऐन्द्रीषु हि तस्मै स्तुवते। -  -- - इन्द्राग्निभ्यां त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामि(वा.सं. ७.२३) इत्येवाच्छावाकाय। ऐन्द्राग्नीषु हि तस्मै स्तुवते। - श.ब्रा. ४.२.३.१२

 

*दक्षिणादानम् अथैवमुपसद्याग्नीधे हिरण्यं ददाति-अस्मद्राता देवत्रा गच्छत (वा.सं.७.४६) इति।- - - अथैवमेवोपसद्य आत्रेयाय। हिरण्यं ददाति। यत्र वाऽअदः प्रातरनुवाकमन्वाहुः- तद्ध स्मैतत् पुरा शंसन्ति। अत्रिर्वाऽऋषीणां होतास। - - -स एतत्तमोऽपाहन्।  - - । अथ ब्रह्मणे। ब्रह्मा हि यज्ञं दक्षिणतोऽभिगोपायति। अथोद्गात्रे। अथ होत्रे। अथाध्वर्युभ्यां। हविर्धान आसीनाभ्यां। अथ पुनरेत्य प्रस्तोत्रे। अथ मैत्रावरुणाय। अथ ब्राह्मणाच्छंसिने। अथ पोत्रे। अथ नेष्ट्रे। अथाच्छावाकाय। अथोन्नेत्रे। अथ ग्रावस्तुते। अथ सुब्रह्मण्यायै प्रतिहर्त्रे उत्तमाय ददाति। - श.ब्रा. ४.३.४.२२

 

*ते(देवाः) हैन्द्रमूचुः त्वं वै नो वीर्यवत्तमोऽसि। त्वं दक्षिणत आस्व। अथाभयेऽनाष्ट्रऽउत्तरतो यज्ञमुपचरिष्याम इति। स होवाचकिं मे ततः स्यादिति। ब्राह्मणाच्छंस्या ते ब्रह्मसाम तऽइति। तस्माद्ब्राह्मणाच्छंसिनं प्रवृणीते। इन्द्रो ब्रह्मा ब्राह्मणादिति इन्द्रस्य ह्येषा। - - -शतपथ ब्राह्मण ४.६.६.५

 

माध्यन्दिने सवने ब्राह्मणाच्छंसिनः शस्त्रं स्तोत्रं तद्ब्रह्मसाम हरिस्वामिन् भाष्यम्

 

*स यत्राहब्रह्मन् स्तोष्यामः प्रशास्तरिति। तद् ब्रह्मा जपति। एतं ते देव सवितर्यज्ञं प्राहुः बृहस्पतये ब्रह्मणे। तेन यज्ञमव, तेन यज्ञपतिम्, तेन मामव(वा.सं. २.१२)। स्तुत सवितुः प्रसवेइति। - - - अनेन त्वेवोपचरेत्। देव सवितरेतद्बृहस्पते प्र इति। तत् सवितारं प्रसवायोपधावति। स हि देवानां प्रसविता। बृहस्पते प्रेति। बृहस्पतिर्वै देवानां ब्रह्मा। - - - । अथ मैत्रावरुणो जपति। प्रसूतं देवेन सवित्रा जुष्टं मित्रावरुणाभ्याम् इति। तत् सवितारं प्रसवायोपधावति। स हि देवानां प्रसविता। जुष्टं मित्रावरुणाभ्याम् इति। मित्रावरुणौ वै मैत्रावरुणस्य देवते। - - - श.ब्रा. ४.६.६.८

 

*दशपेय सोमयागस्य दीक्षातस्य द्वादश प्रथमगर्भाः पष्ठौह्यो दक्षिणा। - - - ता ब्रह्मणे ददाति। ब्रह्मा हि यज्ञं दक्षिणतो गोपायति। तस्मात्ता ब्रह्मणे ददाति। हिरण्मयीं स्रजमुद्गात्रे। रुक्मं होत्रे। हिरण्मयौ प्राकाशावध्वर्युभ्याम्। अश्वं प्रस्तोत्रे। वशां मैत्रावरुणाय। ऋषभं ब्राह्मणाच्छंसिने वाससी नेष्टापोतृभ्याम्। अन्यतरतो युक्तं यवाचितमच्छावाकाय। गामग्नीधे। - श.ब्रा. ५.४.५.२०

 

*अष्टानां धिष्ण्याग्नीनां चयनम्आग्नीध्रीयं प्रथमं चिनोति। - - -तस्मिन्नष्टाविष्टका उपदधाति।- - - एकविंशतिं होत्रीय उपदधाति। एकविंशतिर्वेव परिश्रितः। - - एकादश ब्राह्मणाच्छंस्ये। एकादशाक्षरा वै त्रिष्टुप्। षण्मार्जालीये। षड्वाऽऋतवः। - - श.ब्रा. ९.४.३.५

 

*तस्मा एतस्मै सप्तदशाय प्रजापतय एतत्सप्तदशमन्नं समस्कुर्वन्। य एष सौम्योऽध्वरः। अथ या अस्य ताः षोडश कलाः एते ते षोडशर्त्विजः। तस्मान्न सप्तदशमृत्विजं कुर्वीत- नेदतिरेचयानीति। अथ य एवात्र रसः, या आहुतयो हूयन्ते- तदेव सप्तदशमन्नम्। - श.ब्रा. १०.४.१.१९

 

*संवत्सरो यजमानः, तमृतवो याजयंति। वसंत आग्नीध्रः। तस्माद्वसंते दावाश्चरंति। तद्ध्यग्निरूपम्। ग्रीष्मोऽध्वर्युः। तप्त इव वै ग्रीष्मः। तप्तमिवाध्वर्युर्निष्क्रामति। वर्षा उद्गाता। तस्माद्यदा बलवद्वर्षति। साम्न इवोपब्दिः क्रियते। शरद्ब्रह्मा। तस्माद्यता सस्य़ं पच्यते। ब्रह्मण्वत्यः प्रजा इत्याहुः। हेमन्तो होता। तस्माद्धेमन् वषट्कृताः पशवः सीदंति। - श.ब्रा. ११.२.७.३२

 

*गवामयनब्राह्मणम् तेषां गृहपतिः प्रथमो दीक्षते। - - -अथ ब्रह्माणं दीक्षयति। चन्द्रमा वै ब्रह्मा। सोमो वै चन्द्रमाः। सौम्या ओषधयः। ओषधीस्तदनेन लोकेन संदधाति। - - - अथोद्गातारं दीक्षयति। पर्जन्यो वा उद्गाता। पर्जन्यादु वै वृष्टिर्जायते। अथ होतारं दीक्षयति। अग्निर्वै होताऽधिदेवतम्। वागध्यात्मम्। अन्नं वृष्टिः। अग्निं च तद्वाचं चान्नेन संदधाति। - - -अथाध्वर्युं प्रतिप्रस्थाता दीक्षयति। मनो वा अध्वर्युः। वाग् होता। मनश्च तद्वाचं च सन्दधाति। - - -अथ ब्रह्मणे ब्राह्मणाच्छंसिनं दीक्षयति। तं हि सोऽनु। अथोद्गात्रे प्रस्तोतारं दीक्षयति। तं हि सोऽनु। अथ होत्रे मैत्रावरुणं दीक्षयति। तं हि सोऽनु। एतांश्चतुरः प्रतिप्रस्थाता दीक्षयति। अथाध्वर्यवे प्रतिप्रस्थातारं नेष्टा दीक्षयति। तं हि सोऽनु। - - अथ ब्रह्मणे पोतारं दीक्षयति। तं हि सोऽनु। अथोद्गात्रे प्रतिहर्तारं दीक्षयति। तं हि सोऽनु। अथ होत्रेऽच्छावाकं दीक्षयति। तं हि सोऽनु। एतांश्चतुरो नेष्टा दीक्षयति। अथाध्वर्यवे नेष्टारमुन्नेता दीक्षयति। तं हि सोऽनु। अथ ब्रह्मण आग्नीध्रं दीक्षयति। तं हि सोऽनु। अथोद्गात्रे सुब्रह्मण्यां दीक्षयति। तं हि सोऽनु। अथ होत्रे ग्रावस्तुतं दीक्षयति। तं हि सोऽनु। एतांश्चतुर उन्नेता दीक्षयति। अथोन्नेतारं स्नातको वा ब्रह्मचारी वाऽन्यो वा दीक्षितो दीक्षयति। - - -प्रथमोऽवभृथादुदायतामुदैति। प्राणो वा उन्नेता। - श.ब्रा. १२.१.१.११

 

*अथ ह जनकस्य वैदेहस्य होताऽश्वलो बभूव । स हैनं पप्रच्छ । त्वं नु खलु नो याज्ञवल्क्य ब्रह्मिष्ठोऽसी ३ इति। स होवाच नमो वयं ब्रह्मिष्ठाय कुर्मः। गोकामा एव वयं स्म इति। तं ह तत एव प्रष्टुं दध्रे होताऽश्वलः। याज्ञवल्क्येति होवाच। यदिदं सर्वं मृत्युनाऽऽप्तम्। सर्वं मृत्युनाऽभिपन्नम्। केन यजमानो मृत्योराप्तिमतिमुच्यते इति। होत्रर्त्विजाऽग्निना वाचा। वाग्वै यज्ञस्य होता। तद्येयं वाक्। सोऽयमग्निः। स होता। सा मुक्तिः। साऽतिमुक्तिः।५। याज्ञवल्क्येति होवाच। यदिदं सर्वमहोरात्राभ्यामाप्तम्। सर्वमहोरात्राभ्यामभिपन्नम्। केन यजमानोऽहोरात्रयोराप्तिमतिमुच्यत इति। अध्वर्युणार्त्विजा चक्षुषाऽऽदित्येन। चक्षुर्वै यज्ञस्याध्वर्युः। तद्यदिदं चक्षुः। सोऽध्वर्युः। सा मुक्तिः। साऽतिमुक्तिः।६। याज्ञवल्क्येति होवाच। यदिदं सर्वं पूर्वपक्षापरपक्षाभ्यामाप्तम्। सर्वं पूर्वपक्षापरपक्षाभ्यामभिपन्नम्। केन यजमानः पूर्वपक्षापरपक्षयोराप्तिमतिमुच्यत इति। ब्रह्मणर्त्विजा मनसा चन्द्रेण। मनो वै यज्ञस्य ब्रह्मा। तद्यदिदं मनः। सोऽसौ चंद्रः। स ब्रह्मा। सा मुक्तिः। साऽतिमुक्तिः।७। याज्ञवल्क्येति होवाच। यदिदमंतरिक्षमनारंबणमिव । अथ केनाक्रमेण यजमानः स्वर्गं लोकमाक्रमते इति। उद्गात्रर्त्विजा वायुना प्राणेन। प्राणो वै यज्ञस्योद्गाता। तत् यः अयं प्राणः। स वायुः स उद्गाता सा मुक्तिः। साऽतिमुक्ति। इत्यतिमोक्षाः। अथ संपदः।८। याज्ञवल्क्येति होवाच। कतिभिरयमद्य ऋग्भिर्होता अस्मिन् यज्ञे करिष्यतीति। तिसृभिरिति। कतमास्तास्तिस्र इति। पुरोऽनुवाक्या च याज्या च। शस्यैव तृतीया। किं ताभिर्जयतीति। पृथिवी लोकमेव पुरोऽनुवाक्यया जयति। अंतरिक्षलोकं याज्यया। द्यौर्लोकं शस्यया।९। याज्ञवल्क्येति होवाच। कत्ययमद्याध्वर्युरस्मिन् यज्ञे आहुतीर्होष्यतीति। तिस्र इति। कतमास्तास्तिस्र इति। या हुता उज्ज्वलन्ति। या हुता अतिनेदंति। या हुता अधिशेरते। किं ताभिर्जयतीति। या हुता उज्ज्वलंति देवलोकमेव ताभिर्जयति। दीप्यत इव हि देवलोकः। या हुता अतिनेदंति। मनुष्यलोकमेव ताभिर्जयति। अतीव हि मनुष्यलोकः। या हुता अधिशेरते। पितृलोकमेव ताभिर्जयति। अध इव हि पितृलोकः। १०। याज्ञवल्क्येति होवाच। कतिभिरयमद्य ब्रह्मा यज्ञं दक्षिणतो देवताभिर्गोपायिष्यतीति। एकयेति। कतमा सैकेति। मन एवेति। अनंतं वै मनः। अनंता विश्वे देवाः। अनंतमेव स तेन लोकं जयति। ११।याज्ञवल्क्येति होवाच। कत्ययमद्योद्गाताऽस्मिन् यज्ञे स्तोत्रियाः स्तोष्यतीति। तिस्र इति। कतमास्तास्तिस्र इति। पुरोऽनुवाक्या च, याज्या च, शस्यैव तृतीया। अधिदेवतम्। अथाध्यात्मम्। कतमास्ताः। या अध्यात्ममिति। प्राण एव पुरोऽनुवाक्या। अपानो याज्या। व्यानः शस्या। किं ताभिर्जयतीति। यत्किंचेदं प्राणभृदिति। ततो ह होता अश्वल उपरराम। - श.ब्रा. १४.६.१.१

 

*दशपेयः प्राका॒शाव॑ध्व॒र्यवे॑ ददाति॒ स्रज॑मुद्गा॒त्रे रु॒क्मं होत्रेऽश्वं॑ प्रस्तोतृप्रतिह॒र्तृभ्यां॒ द्वाद॑श पष्ठौ॒हीर्ब्र॒ह्मणे॑ व॒शां मै॑त्रावरु॒णाय॑र्ष॒भं ब्रा॑ह्मणाच्छ॒ ँसिने॒ वास॑सी नेष्टापो॒तृभ्या॒ ँ स्थूरि॑ यवाचि॒तम॑च्छावा॒काया॑न॒ड्वा॑हम॒ग्नीधे॑ भार्ग॒वो होता॑ भवति श्राय॒न्तीयं॑ ब्रह्मसा॒मं भ॑वति तै.सं. १.८.१८.१

 

*चतुर्होतारः चित्तिः स्रुक्, चित्तमाज्य ँ. वाग्वेदिराधीतं बर्हिः, केतो अग्निर्विज्ञातमग्नीद्, वाचस्पतिर्होता, मन उपवक्ता, प्राणो हविः, सामाध्वर्युरिन्द्रं गछ स्वाहा, पृथिवी होता, द्यौरध्वर्युस्त्वष्टाग्नीन्मित्र उपवक्ता, वाचस्पते वाचो वीर्येण संभृततमेनायक्षसे, - - - - -ऽग्निर्होता, ऽश्विनाध्वर्यू, रुद्रो अग्नीद्, बृहस्पतिरुपवक्ता, - - - - महाहविर्होता, सत्यहविरध्वर्युरचित्तपाजा अग्नीदचित्तमना उपवक्ता, ऽनाधृष्यश्चाप्रतिधृष्यश्चाभिगरा, अयास्य उद्गाता मैत्रायणी संहिता १.९.१

 

*प्रजापतिर्वा एक आसीत्, सो ऽकामयत, यज्ञो भूत्वा प्रजाः सृजेयेति, स दशहोतार ँ यज्ञमात्मान ँ व्यधत्त, स चित्ति ँ स्रुचमकुरुत, चित्तमाज्य ँ वाच ँ वेदिमा ऽधीतं बर्हिः, - - - मै.सं. १.९.३

 

*ते वै चतुर्होतारो न्यसीदन् त्सोमगृहपतया, इन्द्रं जनयिष्यामा इति पृथिवी होतासीद्, द्यौरध्वर्युस्त्वष्टाग्नीन्मित्र उपवक्ता ते वा एतौ ग्रहाअगृह्णत- - - - -त इन्द्रं जनयित्वाब्रुवन्, त्स्वरयामेति, ते वै पञ्चहोतारो न्यसीदन् वरुणगृहपतयो, ऽग्निर्होतासीदश्विनाध्वर्यू, रुद्रो अग्नीद्, बृहस्पतिरुपवक्ता, - - - -मै.सं. १.९.४

 

*ते वै स्वर्यन्तो ऽब्रुवन्नतो नो यूयं प्रयछत, - - ते वै सप्तहोतारो न्यसीदन्नर्यमगृहपतयो, महाहविर्होतासीत्, सत्यहविरध्वर्युरचित्तपाजा अग्नीदचित्तमना उपवक्ता, ऽनाधृष्यश्चाप्रतिधृष्यश्चाभिगरा, अयास्य उद्गाता- - - -प्राणो वै दशहोता, चक्षुश्चतुर्होता, श्रोत्रं पञ्चहोता, वाक्चात्मा च सप्तहोता, ऽग्निहोत्र ँ वै दशहोता, दर्शपूर्णमासौ चतुर्होता, चातुर्मास्यानि पञ्चहोता, सौम्यो ऽध्वरः सप्तहोता, ऽऽयुषे कमग्निहोत्र ँ हूयते, - - -चक्षुषे कं दर्शपूर्णमासा इज्येते- - -, श्रोत्राय कं चातुर्मास्यानीज्यन्ते, - - -वाचे चात्मने च कं  सौम्योऽध्वर इज्यते, - - -मै.सं. १.९.५

 

*इन्द्र॒ सोमं॒ पिब॑ ऋ॒तुना ऽऽ त्वा॑ विश॒न्त्विन्द॑वः। म॒त्स॒रास॒स्तदो॑कसः॥

 

मरु॑तः॒ पिब॑त ऋ॒तुना॑ पो॒त्राद् य॒ज्ञं पु॑नीतन। यू॒यं हि ष्ठा सु॑दानवः॥

 

अ॒भि य॒ज्ञं गृ॑णीहि नो॒ ग्नावो॒ नेष्टः॒ पिब॑ ऋ॒तुना॑। त्वं हि र॑त्न॒धा असि॑॥

 

अग्ने॑ दे॒वाँ इ॒हा व॑ह सा॒दया॒ योनि॑षु त्रि॒षु। परि॑ भूष॒ पिब॑ ऋ॒तुना॑॥

 

ब्राह्म॑णादिन्द्र॒ राध॑सः॒ पिबा॒ सोम॑मृ॒तूँरनु॑। तवेद्धि स॒ख्यमस्तृ॑तम्॥

 

यु॒वं दक्षं॑ धृतव्रत॒ मित्रा॑वरुण दू॒ळभ॑म्। ऋ॒तुना॑ य॒ज्ञमा॑शाथे॥

 

द्र॒वि॒णो॒दा द्रवि॑णसो॒ ग्राव॑हस्तासो अध्व॒रे। य॒ज्ञेषु॑ दे॒वमी॑ळते॥

 

द्र॒वि॒णो॒दा द॑दातु नो॒ वसू॑नि॒ यानि॑ शृण्वि॒रे। दे॒वेषु॒ ता व॑नामहे॥

 

द्र॒वि॒णो॒दाः पि॑पीषति जुहोत॒ प्र च॑ तिष्ठत। ने॒ष्ट्रादृ॒तुभि॑रिष्यत॥

 

यत् त्वा॑ तु॒रीय॑मृ॒तुभि॒र्द्रवि॑णोदो॒ यजा॑महे। अध॑ स्मा नो द॒दिर्भ॑व॥

 

अश्वि॑ना॒ पिब॑तं॒ मधु॒ दीद्य॑ग्नी शुचिव्रता। ऋ॒तुना॑ यज्ञवाहसा॥

 

गार्ह॑पत्येन सन्त्य ऋ॒तुना॑ यज्ञ॒नीर॑सि। दे॒वान् दे॑वय॒ते य॑ज॥ - ऋ. १.१५

 

*तृतीयसवने प्रस्थितयाज्या प्रकरणम् इन्द्र ऋभुभिर्वाजवद्बिरिति(होता) यजति। इन्द्रावरुणा सुतपाविति मैत्रावरुणः। इन्द्रश्च सोममिति ब्राह्मणाच्छंसी। आ वो वहन्त्विति पोता। अमेव न इति नेष्टा। इन्द्राविष्णू पिबतमित्यच्छावाकः। इमं स्तोममित्याग्नीध्रः। समानमन्यत्प्रातःसवनेन। इळामुपहूय प्रस्थितान्भक्षयित्वा। - शांखायन श्रौ.सू. ८.२.५